जर्मनी की भू-राजनीतिक दोहरी चाल: यूक्रेन को यूरोपीय संघ में सहयोगी सदस्यता और नाटो की कमान का दावा
चांसलर मेर्ज़ ने बिना मतदान अधिकार के ‘सहयोगी सदस्य’ का रास्ता सुझाया; जर्मनी ने यूरोपीय नाटो नेतृत्व संभालने की इच्छा जताई, जिसे अमेरिकी तनाव से जोड़कर देखा जा रहा है।

जर्मनी ने एक साथ दो मोर्चों पर भू-राजनीतिक पहल करते हुए यूक्रेन को यूरोपीय संघ का ‘सहयोगी सदस्य’ बनाने का प्रस्ताव रखा है और यूरोप में नाटो की नेतृत्वकारी भूमिका के लिए अपनी तैयारी का संकेत दिया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका के साथ द्विपक्षीय संबंधों और गठबंधन के भीतर संतुलन को लेकर तनाव गहरा रहा है, और वॉशिंगटन का ध्यान ईरान में छिड़ी जंग ने खींच रखा है [A1][A5][A6]। चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ ने यूरोपीय संघ के शीर्ष अधिकारियों को लिखे पत्र में यूक्रेन को बिना मतदान अधिकार के सहयोगी सदस्यता देने का विचार सामने रखा, ताकि कीव को भू-राजनीतिक किनारे न लगने दिया जाए [A3][A6]। विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने साफ कहा कि जर्मनी ‘यूरोप में नाटो की नेतृत्व की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है’ [A4][A5]।
जर्मन प्रस्ताव के अनुसार, यूक्रेन को एक ऐसा दर्जा दिया जाए जिससे वह संघ का निकट सहयोगी तो बने पर निर्णय प्रक्रिया में उसकी भागीदारी सीमित रहे। फ्रैंकफर्टर आलगेमाइने (एफएज़ेड) के विश्लेषण में इस सूत्र को ‘एक रास्ता’ बताया गया है और जोर दिया गया कि यह मामला केवल सैन्य नहीं, बल्कि महाद्वीप पर स्वतंत्रतावादी बनाम सत्तावादी मूल्यों के टकराव का राजनीतिक सवाल है [A2]। लेकिन ब्रुसेल्स में मेर्ज़ के पत्र ने भौहें चढ़ा दी हैं। इल सोल 24 ओरे के अनुसार, यूरोपीय आयोग के अंदरखाने में इसे लेकर चिंता है कि सहयोगी सदस्यता की अवधारणा मौजूदा संधियों पर सवालिया निशान लगा सकती है और अन्य उम्मीदवार देशों के लिए मिसाल बन सकती है [A3]।
यह दोहरी रणनीति अमेरिकी नेतृत्व में आ रही कमी की पृष्ठभूमि में और भी अहम हो जाती है। मिलेनियम पत्रिका ने रेखांकित किया कि बर्लिन, वाशिंगटन के यूरोपीय मामलों से आंशिक रूप से पीछे हटने की आशंका के बीच, खुद को नाटो का नया केंद्रीय स्तंभ साबित करना चाहता है [A5]। रेडियो-कनाडा ने बताया कि ईरान युद्ध में उलझे अमेरिका के कारण यूक्रेन को लेकर अमेरिकी कूटनीतिक प्रयास ठप पड़ चुके हैं, जिसके चलते यूरोपीय संघ रूस के साथ अपनी सीधी बातचीत की संभावना तलाश रहा है [A6]। इन हालात में, मेर्ज़ की पहल यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता की दिशा में एक ठोस कदम की तरह दिखती है।
जर्मनी के इस रुख ने ट्रान्साटलांटिक संबंधों में बदलाव की एक नई रूपरेखा खींच दी है। हफपोस्ट इटालिया ने इसे ‘जर्मन मोड़’ करार दिया, जिसमें कीव को यूरोप से जोड़े रखने और नाटो में अमेरिकी वर्चस्व के विकल्प की तलाश, दोनों समानांतर चल रहे हैं [A1]। आलोचकों का कहना है कि सदस्यता के बदले हुए स्वरूप से विस्तार की नींव कमजोर हो सकती है, लेकिन समर्थक इसे तात्कालिक भू-राजनीतिक जरूरतों का लचीला जवाब मानते हैं। आने वाले महीने बताएंगे कि क्या यह ‘सहयोगी सदस्यता’ का विचार यूरोपीय एकता को मजबूत करेगा या इसे नई दरारों के लिए तैयार करेगा।
एक ही कहानी दूसरी जगहों पर कैसे बताई जाती है।
Russian press covers Merz's proposal with skepticism, highlighting that Ukraine would have no voting rights, effectively a second-class membership. They portray it as a symbolic gesture that does not change real power dynamics within the EU. The focus is on the limitations rather than the opportunity.
Continental European press presents the proposal as a pragmatic, innovative solution to accelerate Ukraine's integration without full membership. They emphasize the urgency of the peace process and the need for creative steps. The tone is generally supportive, framing it as a 'light membership' that balances ambition with realism.
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