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इस्लामाबाद वार्ता बेनतीजा: अमेरिका-ईरान में नहीं बनी सहमति, हॉर्मुज पर तनाव बरकरार

21 घंटे की मैराथन वार्ता के बाद भी परमाणु मुद्दे और हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर गतिरोध बरकरार; उपराष्ट्रपति वेंस 'अंतिम प्रस्ताव' लेकर खाली हाथ लौटे।

भूराजनीति21 स्रोत5 भाषाएँ2 मिनट पढ़नाअपडेट 10:45

इस्लामाबाद में ऐतिहासिक अमेरिका-ईरान शांति वार्ता महज 21 घंटे में बेनतीजा खत्म हो गई। उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस अपने “सर्वश्रेष्ठ और अंतिम प्रस्ताव” के साथ वाशिंगटन लौट गए, जबकि ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर कलीबाफ ने कहा कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पर भरोसा नहीं जगा। सम्मेलन केंद्र में “शांति के लिए बनी” कॉफी के प्यालों के बीच पत्रकार बेहतरी की उम्मीद लगाए बैठे रहे, पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। 1979 की ईरानी क्रांति के बाद इतने ऊंचे स्तर पर यह पहली सीधी बातचीत थी, जो शुरू होते ही ठहर गई।

वाशिंगटन ने स्पष्ट किया कि तेहरान को “सत्यापन योग्य और दीर्घकालिक” रूप से परमाणु हथियार विकसित न करने की गारंटी देनी होगी। वेंस ने कहा, “हमें एक मौलिक प्रतिबद्धता देखनी है, न कि सिर्फ दो साल की मोहलत।” लेकिन ईरान इस मांग को “अत्यधिक” बताते हुए अपनी शर्तें आगे बढ़ाता रहा: विदेशों में जब्त ईरानी फंडों को मुक्त करना, हॉर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी को किसी “उचित समझौते” से जोड़ना, और यूरेनियम संवर्धन पर रियायतों के बदले ठोस आर्थिक राहत की मांग। पश्चिमी मीडिया ने परमाणु मुद्दे को गतिरोध का केंद्र बताया, जबकि ईरानी सूत्रों ने तीन अहम गांठों की चर्चा की – हॉर्मुज, यूरेनियम और जमे हुए फंड।

दुनिया भर की सरकारों ने निराशा जताई। ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने संघर्ष विराम बनाए रखने और फिर से बातचीत शुरू करने की अपील की, जबकि पाकिस्तान ने भी युद्धविराम की पुकार लगाई। हालांकि, वार्ता का दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है – दोनों पक्षों ने आगे संपर्क बनाए रखने की बात कही है, और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने परिणाम को “कोई फर्क नहीं पड़ता” कहकर नई रणनीतिक अनिश्चितता पैदा कर दी है। अब निगाहें इस पर हैं कि क्या ईरान बिना ठोस आश्वासनों के अगले दौर के लिए तैयार होगा, या हॉर्मुज का तनावपूर्ण यथास्थिति और गहराएगा।

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