21 घंटे की मैराथन के बाद अमेरिका-ईरान वार्ता नाकाम, परमाणु मुद्दा बना बाधा
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस्लामाबाद से खाली हाथ लौटते हुए कहा कि ईरान ने परमाणु हथियार न बनाने की स्पष्ट गारंटी नहीं दी; तेहरान ने अमेरिकी मांगों को ‘अतार्किक’ बताया। हॉरमुज जलडमरूमध्य और यूरेनियम भंडार पर गतिरोध बरकरार।

इतिहास के सबसे ऊंचे स्तर के सीधे संवाद के बावजूद, अमेरिका और ईरान पाकिस्तान की मध्यस्थता में हुई पहली दौर की शांति वार्ता में किसी समझौते पर नहीं पहुँच सके। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने रविवार तड़के इस्लामाबाद के सेरेना होटल से रवाना होते हुए स्वीकार किया, “हम किसी समझौते पर नहीं पहुँचे हैं।” यह वार्ता 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद पहली बार दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच आमने-सामने हुई, लेकिन करीब 21 घंटे की गहन बातचीत के बाद भी दूरियाँ बनी रहीं। वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका इस बात की “पुष्ट प्रतिबद्धता” चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही इसके लिए ज़रूरी उपकरण हासिल करेगा। यह माँग ही वार्ता विफलता का मुख्य कारण बनी। [A13][A19][A22]
ईरानी पक्ष ने इसे बिल्कुल अलग ढंग से देखा। तेहरान के वार्ताकारों ने अमेरिका पर “अतार्किक माँगें” रखने का आरोप लगाया और कहा कि जब तक कोई “संतुलित समझौता” नहीं होता, स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा। सरकारी मीडिया और पासदारान से जुड़े सूत्रों ने संकेत दिया कि हॉरमुज जलडमरूमध्य फिलहाल खुलने वाला नहीं है। यूरोपीय प्रेस के अनुसार केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं, बल्कि विदेशों में रुके हुए अरबों डॉलर के ईरानी धन और खनन-निरोधी अभियान जैसे मुद्दे भी बातचीत में बाधक बने। इटली और स्पेन के अख़बारों ने इन्हीं तीन “गांठों” की ओर इशारा किया: हॉरमुज, उच्च-संवर्धित यूरेनियम और जब्त संपत्तियाँ। [A5][A12][A14][A21]
यह नाटकीय घटनाक्रम छह सप्ताह से जारी युद्ध और बीते मंगलवार को ट्रंप द्वारा घोषित नाज़ुक दो-हफ़्ते के संघर्षविराम की पृष्ठभूमि में हुआ। अमेरिकी मीडिया ने याद दिलाया कि राष्ट्रपति ट्रंप ने पहले ईरान की सभ्यता को “एक रात में खत्म” करने की धमकी दी थी, फिर पाकिस्तान की मदद से युद्धविराम कराया। मगर इज़राइल ने लेबनान पर बड़े पैमाने पर हमले जारी रखे, जिससे संघर्षविराम की साख पर ही सवाल उठ गया। ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने वार्ता विफलता को “निराशाजनक” बताते हुए दोनों पक्षों से फिर बातचीत शुरू करने का आह्वान किया। दूसरी ओर, अमेरिकी नौसेना ने हॉरमुज जलडमरूमध्य में दो विध्वंसक जहाज़ उतार दिए, जिससे तनाव और बढ़ा। [A7][A15][A17][A18][A24]
जर्मन और स्विस प्रेस ने इस ऐतिहासिक मुलाकात के प्रतीकात्मक महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा कि “शांति के लिए बनी कॉफ़ी” के नारों के बीच भी कोई नतीजा न निकलना दोनों पक्षों की गहरी आपसी अविश्वास को दर्शाता है। जहाँ अमेरिकी विश्लेषकों ने वेंस के “सर्वश्रेष्ठ और अंतिम प्रस्ताव” वाले रुख़ को ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति माना, वहीं कुछ यूरोपीय टिप्पणीकारों ने इसे ट्रंप प्रशासन की कूटनीतिक सीमाओं का संकेत बताया। फिर भी, दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं हुआ है—ईरान ने कहा कि “कूटनीति कभी समाप्त नहीं होती” और निकट भविष्य में नए दौर की बातचीत की संभावना जताई। [A1][A10][A22][A25]
आगे का रास्ता बेहद कठिन लगता है। इज़राइल द्वारा लेबनान में जारी कार्रवाई और नेतन्याहू की ईरान के साथ किसी भी समझौते को विफल करने की दशकों पुरानी रणनीति, जैसा कि कुछ अमेरिकी जाँच पत्रिकाओं ने उजागर किया, शांति प्रक्रिया को पटरी से उतार सकती है। हॉरमुज का रणनीतिक मार्ग खुलने की उम्मीद फिलहाल धूमिल है, और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके असर की आशंका बढ़ रही है। अगर दोनों पक्ष जल्द ही मेज़ पर नहीं लौटते, तो यह युद्धविराम एक लंबे गतिरोध में बदल सकता है, जिसका खामियाज़ा पूरे पश्चिम एशिया को भुगतना पड़ेगा। [A20][A23]
यह समाचार इन पर प्रकाशित हुआ
32 स्रोत · 5 भाषाएँ · 24 घंटे की खिड़की