ईरान में पहली महिला प्रदर्शनकारी को फांसी की सजा; कजाखस्तान में चीन विरोधी प्रदर्शन पर 19 को जेल
ईरान जनवरी 2026 के विद्रोह से जुड़ी बीता हेममती को फांसी देने जा रहा है, जबकि पश्चिमी हस्तियां खामोश हैं; कजाखस्तान ने चीन के शिंजियांग में मानवाधिकार हनन के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों को 5-5 साल की सजा सुनाई।

ईरान में एक और महिला प्रदर्शनकारी को मौत की सजा सुनाए जाने के साथ ही राजकीय दमन का चक्र और गहरा गया है। बीता हेममती, जिन्हें जनवरी 2026 के सरकार विरोधी आंदोलन से जोड़ा गया है, अपने पति और दो अन्य लोगों के साथ फांसी की सजा पाने वाली पहली महिला बन गई हैं। मानवाधिकार संगठनों के अनुसार, तेहरान की क्रांतिकारी अदालत के न्यायाधीश इमाम अफशारी ने “जमीनी स्तर पर कार्रवाइयों” के आरोप में ये सज़ाएं सुनाईं। अब तक इस आंदोलन से जुड़े सात लोगों को फांसी दी जा चुकी है, जबकि दमन के दौरान हजारों की मौत और दसियों हज़ार गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। अधिकार समूहों का कहना है कि ईरान इज़रायल और अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच मृत्युदंड को भय के औज़ार के रूप में और तेज़ कर सकता है।
इस बीच, पश्चिम की चर्चित नारीवादी हस्तियों की चुप्पी पर सवाल उठ रहे हैं। ईरानी-अमेरिकी डॉक्टर शीला नाज़रियन ने अभिनेत्री एलिज़ाबेथ बैंक्स को सीधे घेरते हुए कहा कि “आप खुद को नारीवादी और मानवतावादी बताती हैं लेकिन जब महिलाओं को आपकी ज़रूरत है, तब आप कहां हैं? आप फ़र्ज़ी और पाखंडी हैं।” नाज़रियन का गुस्सा उस पॉडकास्ट पर भड़का जिसमें बैंक्स ने डोनाल्ड ट्रंप को वोट देने वाली 53 प्रतिशत श्वेत महिलाओं की आलोचना की थी। इस टकराव ने चुनावी बहस और ईरान की सड़कों पर हो रहे जानलेवा संघर्ष के बीच की खाई को उजागर कर दिया।
कहानी सिर्फ़ ईरान तक सीमित नहीं है। कज़ाखस्तान ने पिछले साल चीन के शिनजियांग क्षेत्र में मानवाधिकार हनन के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले 19 लोगों को पाँच-पाँच साल जेल की सज़ा सुनाई। अताज़ुर्ट आंदोलन से जुड़े इन प्रदर्शनकारियों ने चीनी झंडे और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीरें जलाई थीं, तथा शिनजियांग में बंदी एक कज़ाख नागरिक की रिहाई की माँग की थी। अदालत ने “अंतर-जातीय या सामाजिक कलह भड़काने” का आरोप सिद्ध माना। यह कार्रवाई बताती है कि मध्य एशिया में चीन का प्रभाव किस तरह असहमति को कुचलने तक फैल गया है।
ये घटनाएं एक वैश्विक पैटर्न सामने रखती हैं— सत्तावादी शासन महिलाओं और अल्पसंख्यकों की आवाज़ को दबाने के लिए फांसी और लंबी सज़ाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि भू-राजनीतिक संकट इस दमन को और पुख्ता करते हैं। पश्चिम की सेलिब्रिटी संस्कृति चुनावी असहमति पर तो मुखर है, लेकिन जहाँ असली ख़तरा है वहाँ खामोशी या छिटपुट प्रतिक्रिया ही दिखती है। आने वाले महीनों में ईरान में और फांसियों की आशंका है, और कज़ाखस्तान का कदम बीजिंग के प्रति उसकी संवेदनशीलता को रेखांकित करता है— जो मानवाधिकार रक्षकों के लिए चिंता का विषय है।
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