हंगरी में ऑर्बन का सूर्यास्त, बुल्गारिया में ‘नए ऑर्बन’ की आहट
लगातार 16 साल सत्ता में रहने के बाद विक्टर ऑर्बन की करारी हार ने पूर्वी यूरोप के राजनीतिक परिदृश्य को हिला दिया है। बुडापेस्ट में जश्न का माहौल है, लेकिन बुल्गारिया और पोलैंड से विपरीत संकेत आ रहे हैं।

बुडापेस्ट की सड़कों पर उस रात एक ‘मॉश पिट’ जैसा नज़ारा था, जब हज़ारों लोगों ने विक्टर ऑर्बन की चुनावी हार का जश्न मनाया [A1]। पीटर माग्यार के नेतृत्व में विपक्ष ने ‘उदारवादी प्रतिक्रांति’ का वादा करते हुए उस संपूर्ण ढाँचे को ध्वस्त करने का संकल्प लिया है जिसे ऑर्बन ने ख़ुद ‘अलिबरल’ कहा था – पक्षपाती न्यायाधीश, अधीन मीडिया और घोर भ्रष्टाचार [A2]। स्वयं ऑर्बन ने हार के बाद पहले विस्तृत साक्षात्कार में आश्चर्यजनक संयम दिखाया; उन्होंने कहा कि वे पहले से अधिक युवा महसूस कर रहे हैं और अपनी पार्टी के व्यापक नवीनीकरण के ज़रिए राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाना चाहते हैं [A5]।
यह हार यूरोपीय अतिदक्षिणपंथ के लिए एक प्रतीकात्मक आघात है, ठीक वैसे ही जैसे किसी हॉलीवुड वेस्टर्न में अमेरिकी आदिवासियों का सरदार ढह जाने पर पूरा हमला बिखर जाता है [A4]। लेकिन इस ‘अनाथ होती सेना’ के ठीक समानांतर बुल्गारिया में एक ऐसा चेहरा उभर रहा है जिसे कई लोग ‘नया ऑर्बन’ मान रहे हैं। पूर्व राष्ट्रपति और रूस को समझने वाले (‘पुतिन-वरश्टेयर’) सेनानिवृत्त जनरल रूमेन रादेव ने समय से पहले पद छोड़कर प्रधानमंत्री बनने की घोषणा की है [A3,A7]। वे बुल्गारिया को बाहरी लोकतांत्रिक चोला पहने एक कुलीनतंत्र बताते हैं और भ्रष्टाचार मिटाने तथा रूस से संवाद बहाल करने का वचन देते हैं; सर्वेक्षणों में उनकी ‘प्रोग्रेसिव बुल्गारिया’ गठबंधन 30-40 प्रतिशत वोट लेती दिख रही है [A7]।
इस बीच पोलैंड में राष्ट्रपति कारोल नावरोत्स्की ने एक नए संविधान की आवश्यकता जताई है, जो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच कार्यकारी शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा करे – वे स्वयं राष्ट्रपति-केंद्रित शासन व्यवस्था के पक्षधर हैं [A6]। यह माँग ऐसे समय आई है जब पोलैंड पहले ही अपनी दक्षिणपंथी सरकार को हटाकर कानूनी शासन की बहाली के जटिल प्रयासों से जूझ रहा है।
विश्लेषकों का मानना है कि हंगरी के पास पोलैंड की तुलना में बेहतर शुरुआती स्थिति हो सकती है, क्योंकि माग्यार को जनता का स्पष्ट जनादेश मिला है और पुराने सत्ता तंत्र में दरारें पहले ही उभर चुकी हैं [A2]। फिर भी, बुल्गारिया में एक ‘पुतिन-वरश्टेयर’ का संभावित उदय और पोलैंड में संवैधानिक खींचतान यह रेखांकित करते हैं कि मध्य एवं पूर्वी यूरोप में अलिबरलवाद का भूत अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यह क्षेत्र पूर्व-पश्चिम विभाजन की एक नई लकीर खींचने की ओर बढ़ता दिख रहा है, जहाँ हंगरी का लोकतांत्रिक नवीनीकरण और बुल्गारिया-पोलैंड के खिंचाव एक साथ सुनाई देते हैं।
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