बार्सिलोना में प्रगतिशील नेताओं की बैठक: आर्थिक एजेंडा बनाम वेनेजुएला विवाद और आलोचना
स्पेन ने कर अमीरों पर लगाने और सार्वजनिक सेवाओं में निजी कारोबार रोकने की रेसिपी पेश की, लेकिन वेनेजुएला पर मतभेद और वाम-दक्षिण विभाजन की बहस ने शिखर सम्मेलन को घेर लिया।

बार्सिलोना में प्रगतिशील नेताओं का जमावड़ा दुनिया की बहुस्तरीय आर्थिक उथल-पुथल के बीच एकजुटता का दावा करने आया, लेकिन अंदरूनी अंतर्विरोधों और बाहरी आलोचनाओं ने इसे शुरू से ही घेर लिया। [A1] के अनुसार, महामारी, ऊर्जा संकट और ब्याज दरों की चढ़ाई के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था अब भी लड़खड़ा रही है। इस पृष्ठभूमि में मेज़बान पेड्रो सांचेज़ की सोशलिस्ट सरकार ने बड़ी संपत्तियों पर कर लगाकर असमानता कम करने और सार्वजनिक सेवाओं को निजी मुनाफे से बचाने का एजेंडा रखा। [A3] के मुताबिक, मेक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शाइनबाम की मौजूदगी को लैटिन अमेरिका के बहुपक्षीय मंचों पर फिर से सक्रिय होने के प्रतीक के रूप में देखा गया। फिर भी, आर्थिक संकल्पों से इतर, वेनेजुएला के राजनीतिक संकट ने मंच के पीछे तीखी बहस छेड़ दी।
वेनेजुएला को लेकर दरार तब साफ हुई जब ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा ने कहा कि “वेनेजुएला वेनेजुएलावासियों का भाग्य है, हमें उसके फैसलों का सम्मान करना चाहिए”—[A2] ने इस टिप्पणी को विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो के प्रति अपमानजनक बताया। उधर, स्पेन सरकार ने मचाडो को मोनक्लोआ में मुलाकात का न्योता दिया, लेकिन बाद में उन पर ही आरोप लगाया कि उन्होंने अवसर को उचित नहीं समझा। इसके विपरीत, मैड्रिड के दक्षिणपंथी मेयर ने मचाडो को ‘स्वर्ण कुंजी’ देकर लोकतंत्र के लिए उनके संघर्ष की सराहना की। यह दोहरा व्यवहार वेनेजुएला पर वैश्विक वामपंथी खेमे की बिखरी हुई सोच को रेखांकित करता है। [A5] के साथ साक्षात्कार में कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेत्रो ने भी अमेरिकी नीति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि अगर वाशिंगटन ने लैटिन अमेरिका के प्रति अपना रुख नहीं बदला तो “विद्रोह होगा”—एक चेतावनी जो इस सम्मेलन के संघर्षपूर्ण स्वर को और बढ़ा गई।
इस बीच, [A4] में प्रकाशित एक आलोचनात्मक टिप्पणी ने प्रगतिशील नेताओं के इस आयोजन को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। लेखक का तर्क है कि वामपंथ को खुद को दक्षिणपंथ से बेहतर समझने का भ्रम पालना बंद करना चाहिए, क्योंकि ऐसे सम्मेलन केवल वैचारिक खाई चौड़ी करते हैं और समाधान नहीं देते। यह दलील उन सभी नेताओं के लिए एक कठिन सवाल थी जो बार्सिलोना में एक बेहतर दुनिया के नुस्खे गढ़ने का दावा कर रहे थे। आर्थिक एजेंडे और भू-राजनीतिक तनावों के बीच यह विमर्श भी जुड़ गया कि क्या बंद कमरों की यह बैठक वास्तव में जनता की पीड़ा कम कर पाएगी।
बार्सिलोना सम्मेलन ने जहां एक ओर अति-अमीरों पर कर और सार्वजनिक-निजी भागीदारी पर लगाम जैसे साझा विचारों को मंच दिया, वहीं वेनेजुएला को लेकर गहराती दरारें और अमेरिका के प्रति पेत्रो की सीधी चुनौती ने इस एकता को कमजोर किया। मेक्सिको की शाइनबाम के लिए यह वैश्विक मंच पर वापसी का अवसर भर था, लेकिन वाम-दक्षिण के व्यापक ध्रुवीकरण और आंतरिक मतभेदों ने बता दिया कि प्रगतिशील गठबंधन के लिए साझा आर्थिक रेसिपी से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है—एक ऐसे लोकतांत्रिक मूल्य पर एक राय रखना जो सबको स्वीकार्य हो।
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