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अमेरिका-ईरान शांति वार्ता नाकाम: 21 घंटे की माथापच्ची के बाद भी नहीं निकला हल

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद अध्यक्ष के बीच इस्लामाबाद में ऐतिहासिक वार्ता 21 घंटे बाद बिना सहमति के टूटी; परमाणु व हॉर्मुज़ पर गतिरोध बरकरार।

भूराजनीति32 स्रोत5 भाषाएँ2 मिनट पढ़नाअपडेट 10:44

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शनिवार को हुई अमेरिका-ईरान की ऐतिहासिक वार्ता 21 घंटे चलने के बाद रविवार तड़के बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने पत्रकारों को बताया, “हम किसी समझौते पर नहीं पहुँच सके हैं और यह हमारे लिए नहीं, बल्कि ईरान के लिए बुरी ख़बर है।” ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाग़ेर ग़ालीबाफ़ की अगुआई वाले प्रतिनिधिमंडल ने इसके लिए अमेरिका की “अत्यधिक माँगों” को जिम्मेदार ठहराया। यह 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद दोनों देशों के बीच सबसे उच्च-स्तरीय सीधी मुलाक़ात थी, जिसे पाकिस्तान ने मध्यस्थता करते हुए आयोजित किया था।

बातचीत में तीन बड़े मुद्दे बाधा बने रहे- हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को तुरंत व्यापारिक जहाजों के लिए खोलना, ईरान का अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम भंडार व उसकी परमाणु महत्त्वाकांक्षाओं पर स्थायी प्रतिबद्धता, तथा विदेशों में जमे ईरानी धन को मुक्त कराने का मामला। वेंस ने स्पष्ट किया कि अमेरिका यह “सकारात्मक वचन” देखना चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार की ओर नहीं बढ़ेगा और न ही इसके लिए ज़रूरी साधन जुटाएगा। दूसरी तरफ़, तेहरान के एक अधिकारी ने फ़ार्स समाचार एजेंसी को बताया कि जब तक अमेरिका “उचित समझौता” स्वीकार नहीं करता, हॉर्मुज़ की स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा।

ये वार्ता एक नाज़ुक युद्धविराम की पृष्ठभूमि में हुई, जो अमेरिकी-इज़राइली हमलों के बाद लागू किया गया था। हालाँकि, इज़राइल ने लेबनान में भारी बमबारी जारी रखी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। विश्लेषकों का मानना है कि यह हमले वार्ता को पटरी से उतारने की कोशिश थे, जैसा कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू पहले भी ईरान के साथ किसी भी कूटनीति को विफल करते रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया की विदेश मंत्री पेनी वोंग ने वार्ता की विफलता पर “निराशा” जताते हुए युद्धविराम जारी रखने और फिर से बातचीत शुरू करने की अपील की।

एक दिन की इस मैराथन के बाद अमेरिकी युद्धपोत हॉर्मुज़ में सुरंग-सफाई अभियान शुरू कर चुके हैं। हालाँकि ईरान ने कहा कि “कूटनीति कभी ख़त्म नहीं होती” और आगे संपर्क जारी रहेंगे, मगर दोनों पक्ष अपनी-अपनी लाल रेखाओं पर अड़े हैं। पश्चिमी मीडिया के अनुसार, यदि ईरान जल्द ही परमाणु मुद्दे पर कोई विश्वसनीय रास्ता नहीं दिखाता, तो खाड़ी क्षेत्र में सैन्य टकराव का ख़तरा बढ़ सकता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता और दो सप्ताह की युद्धविराम समय-सीमा को देखते हुए, आने वाले दिनों में यह तय होगा कि दोनों राजधानियाँ अपने रुख़ में लचीलापन लाती हैं या तनाव और गहराता है।

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