ईरान युद्ध पर पोप लियो का तीखा प्रहार: 'सर्वशक्तिमानता का भ्रम' और शांति की गुहार
वेटिकन की शांति प्रार्थना सभा में पोप ने अमेरिका-इज़रायल के ईरान पर हमले की निंदा की, ट्रंप को आड़े हाथों लिया और वैश्विक संघर्षों पर चिंता जताई।

संत पीटर्स बेसिलिका में शनिवार को आयोजित शांति प्रार्थना सभा में पोप लियो चौदहवें ने अब तक का सबसे कड़ा संदेश देते हुए ईरान में जारी अमेरिकी-इज़रायली युद्ध को 'सर्वशक्तिमानता का भ्रम' करार दिया और तत्काल युद्धविराम की मांग की। प्रार्थना के दौरान उन्होंने 'स्वयं की मूर्तिपूजा' और 'बल प्रदर्शन' को भी निशाने पर लिया, हालाँकि राष्ट्रपति ट्रंप का नाम नहीं लिया। उनका इशारा साफ़ था जब उन्होंने कहा, 'बहुत हुआ युद्ध!' यह बयान ऐसे समय आया जब पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच आमने-सामने की वार्ता शुरू हुई और एक नाज़ुक युद्धविराम कायम था।
यूरोपीय मीडिया में पोप की इस अपील को एक नाटकीय मोड़ के रूप में देखा गया। स्पेनिश अख़बार ला वानगार्दिया ने लिखा कि पोप ने लगभग चिल्लाकर कहा, 'रुको!' उन्होंने युद्ध को 'एक रात का बुरा सपना' बताते हुए अपने पूर्ववर्तियों पॉल षष्टम और जॉन पॉल द्वितीय की शांति अपीलों को दोहराया। वहीं इतालवी दैनिक ला स्ताम्पा ने पोप के उस पहलू पर रोशनी डाली जो अमेरिकी स्रोतों में ग़ायब था: उन्होंने केवल ईरान ही नहीं, बल्कि लेबनान और यूक्रेन के लिए भी प्रार्थना की। 'प्रिय लेबनानी जनता' के लिए संवेदना और 'प्यारे यूक्रेनी लोगों' के लिए सांत्वना की बात कहकर पोप ने दुनिया भर के संघर्षों को एक साथ रेखांकित किया।
अमेरिकी विश्लेषणात्मक पत्रिका द अटलांटिक ने पोप लियो के इस नए तेवर को उनके अब तक के शासनकाल का सबसे निर्णायक क्षण बताया। अब तक आरक्षित और एकता को प्राथमिकता देने वाले पोप ने जान-बूझकर अमेरिकी राष्ट्रपति से सीधे टकराव टाला था, लेकिन ईरान युद्ध ने उन्हें एक अलग ही रूप में सामने ला खड़ा किया। यह भाषण दरअसल उनकी नैतिक सत्ता का वह पक्ष है जो बिखरते कैथोलिक समुदाय को जोड़ने के लिए ज़रूरी था। फ़ॉक्स न्यूज़ ने भी पोप की उस प्रार्थना को उद्धृत किया जिसमें 'न तलवार, न ड्रोन, न बदला' वाले ईश्वर के राज्य की कल्पना की गई।
पोप का यह हस्तक्षेप एक ऐसे दौर में आया है जब तनाव चरम पर है और वैश्विक कैथोलिक नेतृत्व से स्पष्ट नैतिक दिशा-निर्देश अपेक्षित है। आने वाले दिनों में पाकिस्तान वार्ता और युद्धविराम की सफलता पर सबकी नज़र है, लेकिन पोप ने अपनी बात कह कर यह जता दिया है कि धार्मिक मंच से उठी आवाज़ राजनीतिक शक्तियों को चुनौती देने का साहस रखती है।
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