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ईरान युद्ध से वैश्विक मंदी का खतरा, ब्रिटेन को सबसे बड़ा झटका: आईएमएफ की चेतावनी

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आगाह किया है कि अमेरिका-ईरान संघर्ष लंबा खिंचने पर दुनिया मंदी में जा सकती है, ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक प्रभावित होगी और ऊर्जा संकट गहराएगा।

अर्थव्यवस्था7 स्रोत2 भाषाएँ3 मिनट पढ़नाअपडेट 09:32

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने चेतावनी दी है कि अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किया गया युद्ध वैश्विक अर्थव्यवस्था को अप्रत्याशित पैमाने की मंदी और ऊर्जा संकट की ओर धकेल सकता है। संस्था ने अपने ताज़ा आकलन में कहा कि युद्ध के कारण विश्व आर्थिक परिदृश्य “अचानक अंधकारमय” हो गया है, जबकि इससे पहले कोविड-19 जैसे झटकों के बावजूद वैश्विक अर्थव्यवस्था अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन कर रही थी। 2026 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान घटाकर 3.1 प्रतिशत कर दिया गया है, लेकिन यदि संघर्ष गर्मियों तक जारी रहा तो हालात कहीं अधिक खराब हो सकते हैं।

सबसे चिंताजनक तस्वीर ब्रिटेन की है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कठोर आर्थिक झटका झेल रहा है। आईएमएफ ने ब्रिटेन के विकास अनुमानों में जी-7 देशों में सबसे बड़ी कटौती की है, इस वर्ष जीडीपी वृद्धि महज़ 0.8 प्रतिशत और अगले वर्ष 1.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। ऊर्जा कीमतों में उछाल से ब्रिटेन में मुद्रास्फीति 4 प्रतिशत के करीब पहुंचने और बेरोज़गारी 5.6 प्रतिशत तक जाने की आशंका है। स्वयं चांसलर रैचल रीव्स ने स्वीकार किया कि इस युद्ध की “कीमत ब्रिटेन को चुकानी पड़ेगी”।

वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट के बादल गहराते जा रहे हैं। आईएमएफ की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालीना जॉर्जिएवा के अनुसार, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से आपूर्ति बाधित होने से दुनिया को 20 प्रतिशत तेल और गैस नहीं मिल पा रही है। रूसी मीडिया में उनके बयानों को प्रमुखता से उद्धृत किया गया, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय सरकारों से ईंधन निर्यात पर रोक न लगाने की अपील की, ताकि आपूर्ति का झटका और न बढ़े। यदि कच्चे तेल का औसत भाव 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तो वैश्विक वृद्धि और गहरी चोट खा सकती है।

यह संकट केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। जॉर्जिएवा ने चेताया कि जलडमरूमध्य में नौवहन बाधित होने से उर्वरक की लागत बढ़ेगी, जिससे खाद्य कीमतों में इज़ाफ़ा होगा और वैश्विक वृद्धि दर 2 प्रतिशत तक फिसल सकती है। जाने-माने अर्थशास्त्री मोहम्मद अल-एरियन ने इस स्थिति को “स्टैगफ्लेशनरी हवा” करार देते हुए कहा कि यह युद्ध विकास, मुद्रास्फीति, असमानता और सार्वजनिक वित्त से जुड़े लगभग हर संकट को गहरा सकता है।

यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह झटका विशेष रूप से दर्दनाक है, क्योंकि वे आयातित ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यदि गर्मियों तक कोई स्थायी राजनीतिक समाधान नहीं निकला तो दुनिया को एक साथ मंदी और महंगाई के दोहरे आघात का सामना करना पड़ सकता है।

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