ऑस्ट्रेलियाई राज्य का शुद्ध शून्य लक्ष्य दशक भर पीछे, वैश्विक इस्पात उद्योग में कोयले पर निर्भरता बरकरार
वुडसाइड की रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ कि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया 2050 के उत्सर्जन लक्ष्य को कम से कम एक दशक से चूकेगा, जबकि दुनिया भर में इस्पात उत्पादन के लिए कोयला-आधारित भट्टियों की क्षमता पांच प्रतिशत बढ़ गई है।

ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े संसाधन राज्य पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (WA) की 2050 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन की प्रतिबद्धता पहले से ही खटाई में पड़ती दिख रही है। गैस दिग्गज वुडसाइड एनर्जी द्वारा कराए गए डेलॉइट एक्सेस इकोनॉमिक्स के आकलन के अनुसार, राज्य अपने लक्ष्य से लगभग एक दशक पीछे रह जाएगा — चाहे विवादास्पद ब्राउज़ गैस परियोजना आगे बढ़े या नहीं। यह प्रक्षेपण ऐसे समय आया है जब प्रीमियर रोजर कुक ने सार्वजनिक रूप से कहा कि राज्य के बढ़ते उत्सर्जन वैश्विक डीकार्बोनाइज़ेशन में उसकी “महान भूमिका” का परिणाम हैं और “ग्लोब विजेता है।” पर्यावरण संगठनों ने इस बयान को कॉर्पोरेट प्रोपगंडा करार देते हुए खारिज कर दिया है।
यह स्थिति केवल एक देश की नहीं है। अमेरिकी संस्था ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, मानव जनित ग्रीनहाउस गैसों के 11 प्रतिशत उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार वैश्विक इस्पात उद्योग अभी भी कोयले पर बुरी तरह निर्भर है। पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेसों की क्षमता में पिछले वर्ष की तुलना में पाँच प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है और 2035 तक शुद्ध 88 मिलियन टन प्रतिवर्ष की अतिरिक्त क्षमता जुड़ने का अनुमान है। हरित इस्पात की दिशा में प्रगति केवल “मामूली” रही है, जिससे वैश्विक तापमान पर अंकुश लगाने की उम्मीदें कमज़ोर पड़ती जा रही हैं।
प्रीमियर कुक के बयान और इस्पात उद्योग के आँकड़ों के बीच एक अजीब समानता है। दोनों ही मामलों में तात्कालिक आर्थिक हितों — गैस निर्यात और सस्ते कोयला-आधारित उत्पादन — को दीर्घकालिक जलवायु प्रतिबद्धताओं पर तरजीह दी जा रही है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया और उत्तरी क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया के ऐसे इकलौते प्रदेश हैं जिनके पास 2050 से पहले के लिए स्वयं का कोई उत्सर्जन लक्ष्य नहीं है। एबीसी की रिपोर्ट में बताया गया कि संघीय कानून के बावजूद, लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सौर, पवन और बैटरी परियोजनाओं की “अभूतपूर्व” तैनाती की आवश्यकता होगी — जो मौजूदा रफ़्तार से संभव नहीं दिखती।
आलोचकों का कहना है कि पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया खुद को दुनिया की “फर्नेस रूम” के रूप में स्थापित कर रहा है, जहाँ बढ़ते उत्सर्जन अंततः वैश्विक ताप वृद्धि को और तेज़ करेंगे। वुडसाइड का यह तर्क कि ऑफशोर गैस से ऊर्जा संक्रमण की लागत घटेगी, पर्यावरण समूहों के लिए महज़ हरित धुलाई है। फ्रांसीसी अखबार ‘ले फिगारो’ और ‘ले तां’ ने अपनी रिपोर्टों में इसी बात पर ज़ोर दिया कि हरित इस्पात की क्षमता में वृद्धि बेहद धीमी है, जो संकेत देता है कि भारी उद्योग अभी भी जीवाश्म ईंधन के मोह से बाहर नहीं निकल पाए हैं। यदि विकसित अर्थव्यवस्थाएँ भी अपने शुद्ध शून्य वादों को टालती रहीं, तो वैश्विक कार्बन बजट खतरनाक ढंग से सिकुड़ता चला जाएगा।
एक ही कहानी दूसरी जगहों पर कैसे बताई जाती है।
Progressive Atlantic press denounces the hypocrisy of Western Australia's government, which admits missing its climate targets but justifies itself by claiming to help the world decarbonize. It highlights how a Woodside-commissioned report is used to legitimize new fossil fuel projects, while the state remains the world's 'furnace room'. The tone is bitterly ironic toward the premier's 'global winner' rhetoric.
Continental European press reports with concern the Global Energy Monitor data, showing global steel production remains heavily coal-dependent and 'green' steel capacity is increasing only slowly. The emphasis is on the technical figure: 319 million tonnes per year of new coal-based blast furnaces are under construction or announced. The tone is alarmed but measured, focusing on implications for the global climate.
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