ट्रंप का पोप पर तीखा प्रहार: 42 हज़ार ईरानी प्रदर्शनकारियों का दावा, मेलोनी से भी ठनी
अमेरिकी राष्ट्रपति ने पोप लियो XIV को ईरान में हिंसा की अनदेखी का आरोप लगाया, जबकि इतालवी प्रधानमंत्री की पोप के बचाव की आलोचना पर द्विपक्षीय संबंधों पर सवाल उठे।

पोप लियो XIV पर डोनाल्ड ट्रंप की पहली सार्वजनिक टिप्पणी — “अपराध पर कमज़ोर”, “विदेश नीति में भयावह” और “बहुत उदार” — महज़ एक विवाद की शुरुआत थी। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक नए संदेश में न केवल अपनी बात दोहराई, बल्कि पोप पर ईरान में हालिया हिंसा की अनदेखी का सीधा आरोप लगा दिया। “क्या कोई कृपया पोप लियो को बता सकता है कि ईरान ने पिछले दो महीनों में कम से कम 42,000 निहत्थे निर्दोष प्रदर्शनकारियों को मार डाला है और ईरान के पास परमाणु बम होना बिल्कुल अस्वीकार्य है?” ट्रंप ने लिखा, और साथ ही अपनी युद्ध नीति की तरफ़ इशारा करते हुए जोड़ा, “अमेरिका वापस आ गया है!” यह बयान वैश्विक कूटनीति में उस समय असाधारण तनाव ले आया, जब पोप ने ईरान में अमेरिकी सैन्य अभियान की खुलकर आलोचना की थी।
ट्रंप की इस नई चुनौती का पोप ने शांतचित्तता से मुकाबला किया। अल्जीरिया की यात्रा पर रवाना होते विमान में उन्होंने पत्रकारों से कहा कि वे ट्रंप से नहीं डरते, और युद्ध रोकने का उनका आह्वान सुसमाचार पर आधारित है। इस बीच ट्रंप के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने एक कार्यक्रम में कहा कि पोप को धर्मशास्त्र पर सावधानी बरतनी चाहिए, हालांकि वे उनका सम्मान करते हैं। मगर इस धार्मिक-राजनीतिक खींचतान में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का कूदना सबसे अहम मोड़ साबित हुआ। मेलोनी ने ट्रंप की टिप्पणी को “अस्वीकार्य” बताते हुए पोप का बचाव किया, जिसके जवाब में ट्रंप ने फॉक्स न्यूज़ साक्षात्कार में सीधे प्रधानमंत्री पर हमला बोल दिया: “वह नकारात्मक रहीं। जिसने भी ईरान से निपटने में हमारी मदद से इनकार किया, अब उस देश के साथ हमारा वह रिश्ता नहीं रहा।” उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इटली को जलडमरूमध्य से भारी मात्रा में तेल मिलता है, जो एक प्रकार की आर्थिक चेतावनी के रूप में देखा गया।
इस विवाद ने न केवल वैश्विक कूटनीति, बल्कि अमेरिकी घरेलू राजनीति को भी झकझोर दिया। इतालवी मीडिया ने तुरंत रिपोर्ट किया कि ट्रंप के अपने परंपरागत कैथोलिक समर्थक, ख़ास तौर पर ‘मागा’ गुट के लोग, बड़ी संख्या में उनकी निंदा कर रहे हैं। “यह हमला चर्च को अस्वीकार्य लगा,” जैसे वक्तव्य हफ़िंगटन पोस्ट इटली में प्रमुखता से छपे। रोम से लेकर मैड्रिड और मॉस्को तक के विश्लेषकों ने यह बात रेखांकित की कि अमेरिकी मूल के पोप (लियो XIV) के साथ टकराव ट्रंप को महंगा पड़ सकता है, लेकिन साथ ही वॉशिंगटन और वैटिकन दोनों के लिए रिश्तों की मरम्मत का रास्ता निकालना फ़ायदेमंद है। स्पैनिश प्रेस में इस संघर्ष को वैटिकन-व्हाइट हाउस के डेढ़ सदी पुराने तनावपूर्ण संबंधों की नई कड़ी के तौर पर पेश किया गया, जबकि रूसी मीडिया ने इसे ईरान युद्ध पर महाशक्तियों के आख्यान की लड़ाई बताया।
आगे की राह में यह देखना होगा कि क्या ट्रंप का उग्र रुख़ अंतरराष्ट्रीय दबाव में नरम पड़ेगा या कैथोलिक वोटबैंक को साधने के लिए कोई संदेश भेजा जाएगा। वैटिकन का शांति-आधारित रुख़ और अमेरिकी सैन्य अभियान के बीच की खाई अभी गहरी है, और इटली जैसे परंपरागत सहयोगी का नाराज़ होना वाशिंगटन के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकता है। फ़िलहाल, दोनों पक्ष अपनी-अपनी धार्मिक और राजनीतिक ज़मीन पर अडिग दिख रहे हैं।
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