नेपल्स में सिनेमाई बैंक डकैती: बंधकों को बनाया, सीवर से फरार हुए लुटेरे
दिनदहाड़े क्रेडिट एग्रीकोल बैंक में तीन-चार नकाबपोश घुसे, 25 लोगों को बंधक बनाकर दर्जनों तिजोरियाँ लूट लीं और सीवर के रास्ते गायब हो गए; पुलिस खोजबीन में जुटी, पीड़ित अपनी यादें खोने का गम मना रहे हैं।

16 अप्रैल को नेपल्स के पियाज़ा मेदाल्ये द’ओरो स्थित क्रेडिट एग्रीकोल बैंक में दिनदहाड़े हुई डकैती ने इतालवी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचा, लेकिन असली कहानी लुटेरों के बर्ताव और पीड़ितों की भावनात्मक क्षति में छिपी है। तीन से पाँच हथियारबंद नकाबपोश, जिन्होंने चेहरे पर हॉलीवुड कलाकारों के मुखौटे पहन रखे थे, स्थानीय समयानुसार दोपहर करीब साढ़े बारह बजे बैंक में घुसे और 25-30 ग्राहकों व कर्मचारियों को बंधक बना लिया। कई बंधकों ने बाद में बताया कि लुटेरे नापोली बोली बोल रहे थे और उनका रवैया आक्रामक नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरा और लगभग सज्जनतापूर्ण था—एक ने तो मज़ाक में कहा, “हम आज इसलिए आए क्योंकि कल शुक्रवार 17 तारीख है” [A10] [A16]। एक अन्य बंधक ने अख़बारों को बताया कि वे “भड़ास भरे नहीं थे, जैसे फ़िल्मों में दिखते हैं” [A1]।
घटनाक्रम तेज़ी से बदला: पहले सभी को पहली मंज़िल पर भेजा गया, फिर वापस नीचे लाकर मोबाइल जमा कराए गए। तब तक लुटेरों ने तहख़ाने के वॉल्ट में दर्जनों निजी तिजोरियाँ तोड़कर खाली कर दी थीं। पुलिस ने बाहर से घेराबंदी कर बातचीत शुरू की, लेकिन इससे पहले कि लिवोर्नो से जीआईएस कमांडो पहुँचता, लुटेरे फ़र्श में बनाए गए सुरंग के ज़रिए सीवर प्रणाली में उतरकर फ़रार हो गए [A4] [A5]। अग्निशमन कर्मियों ने खिड़की तोड़कर बंधकों को बाहर निकाला; डेढ़-दो घंटे के भीतर सभी सुरक्षित थे। नेपल्स के मेयर गाएतानो मानफ्रेदी ने इसे “सिनेमाई काम” करार दिया [A11], और स्विस अख़बार ने नेटफ़्लिक्स की ‘मनी हाइस्ट’ से तुलना की [A12]।
डकैती के बाद का दृश्य भी कम नाटकीय नहीं रहा। शाम ढलते ही सैकड़ों ग्राहक बैंक के बाहर जमा हो गए, कुछ यह जानने को बेचैन कि उनकी तिजोरी लूटी गई या नहीं। डिप्टी फ्रांचेस्को एमिलियो बोरेल्ली ने भीड़ से बात की [A7]। एक पीड़ित जियामपिएरो लावाज्जी ने बताया कि उनकी तिजोरी में “एक परिवार की ज़िंदगी भर की यादें” थीं—घड़ियाँ-ज़ेवर ही नहीं, वे भावनात्मक धरोहर जो कभी वापस नहीं आएंगी [A13]। इस बीच, नेपल्स की गलियों में लॉटरी का बुखार चढ़ गया: “चिस्ट सो नुम्मेर” (ये हैं नंबर) कहते हुए लोगों ने घटना के अंकों पर दाँव लगाना शुरू कर दिया [A8]।
अंतरराष्ट्रीय नज़रिए से देखें तो इतालवी प्रेस ने लुटेरों की शालीनता और स्थानीय पहचान पर ज़ोर दिया, जबकि स्विस ‘टागेस-आंत्साइगर’ ने पुलिस की हैरानी और सुरंग-पलायन को केंद्र में रखा [A12]। रूसी ‘कोम्मेरसंत’ ने मात्र इतना लिखा कि पुलिस ने बैंक को मुक्त कराया तब तक लुटेरे सीवर के रास्ते जा चुके थे [A17]। बीबीसी और एल पाइस जैसे माध्यमों ने इस घटना को एक सधी हुई साज़िश के रूप में पेश किया, मगर किसी ने भी यह नहीं बताया कि लूट की सही कीमत क्या है—क्योंकि तिजोरियों में रखा सामान केवल मालिकों को ही मालूम था।
अब तक लुटेरों का कोई सुराग नहीं है। जाँचकर्ताओं को अंदरूनी मददगार की आशंका है, जिसने वॉल्ट और सीवर तक पहुँच की जानकारी दी हो [A2]। बैंक की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं, जबकि पीड़ित मुआवज़े की माँग कर रहे हैं। पर सबसे गहरा घाव उन लोगों का है जिन्होंने सिर्फ़ कीमती सामान नहीं, अपने अतीत का एक टुकड़ा खो दिया। यह डकैती सिर्फ़ एक आपराधिक कारनामा नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति पर हमला बन गई।
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