ट्रम्प के बॉलरूम निर्माण पर रोक की समीक्षा, पारदर्शिता विवाद नया मोड़ लेता है
एक अपीलीय अदालत ने व्हाइट हाउस बॉलरूम के निर्माण को फिलहाल जारी रखने की अनुमति दी, साथ ही निचली अदालत को राष्ट्रीय सुरक्षा पहलुओं पर पुनर्विचार का निर्देश दिया। इसी बीच न्याय विभाग ने राष्ट्रपति रिकॉर्ड्स को सार्वजनिक करने वाले वाटरगेट-कालीन नियम को समाप्त करने की मांग की है।

अमेरिकी न्यायपालिका ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के 40 करोड़ डॉलर के भव्य बॉलरूम निर्माण से जुड़े विवाद में एक जटिल क़ानूनी मोड़ ला दिया है। शनिवार को कोलंबिया सर्किट की अपीलीय अदालत की तीन-जजों की पीठ ने माना कि इस परियोजना को रोकने के निचली अदालत के आदेश के राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावों का पर्याप्त आकलन नहीं हो पाया है, इसलिए मामला वापस ट्रायल जज के पास भेज दिया गया [A1][A5]। इसके साथ ही बेंच ने पूर्व आदेश पर लगी रोक को 17 अप्रैल तक बढ़ा दिया, जिससे निर्माण कार्य अस्थायी रूप से जारी रखने का मार्ग प्रशस्त हो गया [A2][A4]।
यूरोपीय मीडिया ने इस क़ानूनी खींचतान को अमेरिकी कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन के परिप्रेक्ष्य में पेश किया। स्पेन के ला वेंगार्डिया ने रेखांकित किया कि व्हाइट हाउस ने तर्क दिया है कि निर्माण रुकने से राष्ट्रपति, उनके परिवार और स्टाफ़ की सुरक्षा ख़तरे में पड़ सकती है [A2]। जर्मनी की ज़ूडॉयचे त्साइटुंग ने भी इसी तर्क को उद्धृत करते हुए लिखा कि यह विवाद मूलतः कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना शुरू की गई परियोजना की वैधता पर केंद्रित है [A4]। अमेरिकी स्रोतों के अनुसार, नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर हिस्टोरिक प्रिज़र्वेशन द्वारा दायर मुक़दमे में ट्रम्प प्रशासन इसी तर्क के बल पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने की तैयारी कर रहा है [A5]।
इसी बीच, द इंटरसेप्ट की एक रिपोर्ट ने प्रशासन की पारदर्शिता की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। न्याय विभाग के विधिक परामर्श कार्यालय (ओएलसी) ने एक नए ज्ञापन में वाटरगेट कांड के बाद बने राष्ट्रपति रिकॉर्ड्स एक्ट को कमज़ोर करने का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत राष्ट्रपतियों को ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को सार्वजनिक करने की बाध्यता से लगभग मुक्त किया जा सकता है [A3]। लेखिका लॉरेन हार्पर ने चेताया है कि इस क़दम से भावी प्रशासनों को कूटनीतिक निर्णयों के पीछे के विचार-विमर्श से वंचित होना पड़ेगा, जिससे जवाबदेही का तंत्र कमज़ोर होगा [A3]।
ये दोनों घटनाक्रम मिलकर कार्यपालिका की निरंकुशता की प्रवृत्ति की ओर इशारा करते हैं। एक ओर बिना कांग्रेसी मंज़ूरी के अरबों रुपये की परियोजना को अदालती रोक से बचाने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का तर्क दिया जा रहा है, तो दूसरी ओर भविष्य के सभी राष्ट्रपतियों को अपने कार्यकाल के संवेदनशील निर्णयों को गोपनीय रखने की लाइसेंस देने की कोशिश हो रही है। आने वाले सप्ताहों में सुप्रीम कोर्ट के संभावित हस्तक्षेप और निचली अदालत की विस्तृत समीक्षा से तय होगा कि प्रशासनिक सुविधा और ऐतिहासिक जवाबदेही के बीच संतुलन किस करवट बैठता है।
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