मुक्तदा अल-सद्र ने 'सराया अल-सलाम' को राज्य में विलय करने का एलान; ईरानी प्रभाव को झटका
प्रधानमंत्री अली फ़ालेह अल-ज़ैदी ने सद्र के कदम की सराहना करते हुए सभी सशस्त्र गुटों से राज्य के अधीन आने का आह्वान किया; क्षेत्रीय तनावों के बीच जून में 'गर्म स्थिति' की आशंका।

इराक की राजनीति में उस वक्त अप्रत्याशित हलचल मच गई जब शिया धर्मगुरू मुक्तदा अल-सद्र ने अपने सशस्त्र संगठन 'सराया अल-सलाम' को 'राष्ट्रीय शिया धारा' से पूर्णतः अलग कर उसे राज्य के सैन्य ढांचे में विलय करने की घोषणा कर दी। सद्र ने अपने बयान में इस कदम को 'राष्ट्रहित में' बताया और स्पष्ट किया कि समूह का नागरिक अंग 'अल-बुनियान अल-मरसूस' के नाम से बिना किसी मुख्यालय, हथियार, वर्दी या चिह्न के काम करेगा। इराकी प्रधानमंत्री अली फ़ालेह अल-ज़ैदी ने त्वरित प्रतिक्रिया देते हुए इस निर्णय को 'राष्ट्रीय स्थिरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम' करार दिया और सभी सशस्त्र धड़ों से 'राज्य की छत्रछाया में आकर संवैधानिक दायित्व निभाने' की अपील की।
अरब मीडिया में इस कदम को राज्य के संस्थागत अधिकार को मज़बूती देने के रूप में देखा गया, वहीं फ़ारसी-भाषी सूत्रों ने ख़ास तौर पर इसे 'ईरान की प्रॉक्सी संरचना पर एक और प्रहार' के तौर पर रेखांकित किया। सरकारी समाचार एजेंसी के हवाले से सामने आए ब्यौरों में बताया गया कि सद्र ने अपनी धार्मिक और सामाजिक पसंद से मेल न खाने वालों के लिए क्षमा की बात भी कही। रेडियो फ़रदा के अनुसार, सद्र ने 'हश्द अल-शाबी' बलों से भी पार्टी और सांप्रदायिक आदेशों से दूरी बनाने की अपील की, जिससे इस कवायद का व्यापक लक्ष्य स्पष्ट होता है।
हालाँकि, अल-मुदुन में प्रकाशित एक विश्लेषण के अनुसार, एक वरिष्ठ इराकी पदाधिकारी ने बताया कि ईरान ने सद्र के इस कदम को टालने के लिए अंतिम समय पर कूटनीतिक संदेश भेजे थे, क्योंकि इससे तेहरान की स्थिति कमज़ोर होती है। सूत्र ने आगाह किया कि जून का महीना इराक के लिए बेहद गर्म रहने वाला है और सद्र का निर्णय क्षेत्रीय आवृत्तियों को तेज़ी से पकड़ने की उनकी क्षमता को दर्शाता है। यह संदर्भ बताता है कि यह केवल आंतरिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि अमेरिकी दबाव और ट्रंप प्रशासन के रुख के मद्देनज़र ईरानी प्रभाव को काटने की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सद्र की इस पहल के बाद अन्य सशस्त्र गुटों पर भी ऐसे ही कदम उठाने का दबाव बढ़ेगा। प्रधानमंत्री के आह्वान और 'हथियार केवल राज्य के पास' के सिद्धांत को दोहराए जाने से यह संदेश गया है कि इराक अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था में ग़ैर-राज्य तत्वों की भूमिका को सीमित करना चाहता है। आने वाले हफ्तों में हश्द अल-शाबी के भीतर इसका कितना असर पड़ता है, यह पूरे पश्चिम एशियाई सुरक्षा नक्शे को प्रभावित कर सकता है।
एक ही कहानी दूसरी जगहों पर कैसे बताई जाती है।
The Iraqi government has warmly welcomed al-Sadr’s decision to incorporate Saraya al-Salam into state structures, calling it a responsible national step. This move reinforces state sovereignty and the rule of law, while the prime minister urges all armed factions to follow suit and operate under the state umbrella to strengthen internal stability.
Al-Sadr’s order to disband his militia and merge it with the Iraqi army is another blow to Iran’s proxy network. The move exposes Tehran’s weakening grip over Shia factions and quickens the collapse of the so-called ‘resistance’ front, signaling a strategic realignment driven by mounting internal and external pressure.
Iraqi armed factions are effectively surrendering to Trump’s pressure, fueling fears of an Iranian meltdown. Sadr’s dissolution of his military wing is a clever, early catch of the shifting regional winds. A hot June is looming as the state’s monopoly on weapons accelerates — the last gasp of irregular arms in the Middle East.
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