लियान्ना हत्याकांड: न्यायिक चूकों पर फ्रांस में गुस्सा, अंतरराष्ट्रीय सवाल
फ्लोरॉंस में 11 वर्षीय बालिका का अंतिम संस्कार हुआ, जबकि पुलिस-अदालती विफलताओं और अमेरिकी चेतावनियों की अनदेखी से जनता में आक्रोश है।

फ्रांस के दक्षिण-पश्चिमी शहर फ्लोरॉंस में शुक्रवार को एक पीड़ादायक दृश्य उभरा: 11 वर्षीय लियान्ना का अंतिम संस्कार, जिसकी हत्या ने पूरे राष्ट्र को हिला दिया है। लगभग 200 लोग इस शोक सभा में शामिल हुए, जहाँ स्कूल के बाहर लगे बैनर पर लिखा था, 'हम तुम्हें नहीं भूलेंगे, हम सब बच्चों के लिए लड़ेंगे।' स्थानीय व्यापारी लॉरा ने बताया, 'इतना शांत जून कभी नहीं देखा।' गेर्स क्षेत्र के मेयरों ने आधे झुके झंडों के साथ टाउन हॉल के बाहर एकजुटता का आह्वान किया था। यह माहौल सिर्फ शोक का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति गहरे गुस्से का था जो बार-बार चूक कर चुकी थी।
इस हफ्ते उजागर हुई विफलताओं की श्रृंखला ने फ्रांसीसी न्यायपालिका और पुलिस पर से भरोसा उखाड़ दिया है। मुख्य आरोपी जेरोम बरेला पर एक 10 वर्षीय बच्ची के यौन शोषण का आरोप नौ महीने पहले लगा था, लेकिन पुलिस ने उससे पूछताछ तक नहीं की। इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि अमेरिकी संस्था नैशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन (NCMEC) ने 2023 में ही फ्रांस के नाबालिग कार्यालय (Ofmin) को कई चेतावनी संकेत भेजे थे। एक पुलिस सूत्र के अनुसार, ये संकेत 'तीन लाख वार्षिक सिग्नलों के सागर में एक अत्यंत कमज़ोर संकेत' मानकर नज़रअंदाज़ कर दिए गए। लियान्ना की हत्या से पता चलता है कि किस तरह प्रशासनिक लापरवाही ने एक सिलसिलेवार अपराधी को खुला छोड़ दिया।
न्यायिक हलकों से आई प्रतिक्रियाओं ने विवाद को और गहरा दिया है। मजिस्ट्रेट संघों ने संसाधनों की कमी का राग छेड़ा, लेकिन पूर्व अन्वेषी न्यायाधीश हर्वे लेमाँ ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका कहना है, 'संसाधनों की कमी का बहाना सिर्फ इसलिए दिया जाता है ताकि न्यायपालिका अपनी कार्यशैली में कोई बदलाव न करे।' स्तंभकार लॉरेंस डी शारेट ने 2005 के आउट्रो प्रकरण की याद दिलाई, जिसमें 13 निर्दोषों को तीन साल जेल में बिताने पड़े, और उसी तरह 'न्यायाधीशों ने जवाबदेही से बचने की कोशिश की।' जनता की माँग है कि इस बार व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी तय हो, सिर्फ व्यवस्थागत आलोचना नहीं।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस घटना को फ्रांसीसी राज्य पर 'धब्बा' बताया है। इटली के हफ़पोस्ट ने शोक संदेशों के साथ लिखा कि यह 'सामूहिक अपराधबोध' का समय है। ब्रिटिश बीबीसी ने भी पुलिस विफलताओं पर उठ रहे सवालों को रेखांकित किया। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी संस्था और फ्रांसीसी एजेंसियों के बीच संवाद की कमी ने अंतरराष्ट्रीय बाल संरक्षण तंत्र की कमज़ोरियों को उजागर किया है। क्या यह त्रासदी न्याय व्यवस्था में ठोस सुधार ला पाएगी? अभी तक संकेत निराशाजनक हैं, क्योंकि अधिकारी आत्मनिरीक्षण से बचते दिख रहे हैं। लियान्ना की याद, हालाँकि, एक मशाल बन सकती है, जो यह सुनिश्चित करने के लिए जलती रहेगी कि कोई और बच्चा इसी तरह न छूटे।
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