ग्रीनलैंड में अमेरिकी दूत का बयान: “अब समय है अपनी छाप फिर से छोड़ने का”
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के विशेष दूत जेफ़ लैंड्री ने पहली ग्रीनलैंड यात्रा के दौरान कहा कि वाशिंगटन को इस आर्कटिक द्वीप पर अपनी सैन्य उपस्थिति फिर से मजबूत करनी चाहिए। उनकी यह टिप्पणी बिन बुलाए दौरे के विवाद के बीच आई है।

अमेरिकी विशेष दूत जेफ़ लैंड्री ने बुधवार को ग्रीनलैंड में कहा कि अब समय आ गया है जब संयुक्त राज्य अमेरिका इस डेनिश स्वायत्त क्षेत्र में अपनी छाप फिर से स्थापित करे। एएफ़पी को दिए गए बयान में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रीय सुरक्षा अभियानों को बढ़ाने और ग्रीनलैंड में कुछ सैन्य ठिकानों को फिर से सक्रिय करने की बात कर रहे हैं। [A1][A2][A4] यह बयान उनकी दिसंबर 2025 में नियुक्ति के बाद पहली ग्रीनलैंड यात्रा के समापन पर आया, जिसे लेकर स्थानीय स्तर पर विवाद भी खड़ा हो गया क्योंकि उन्हें औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया गया था। [A2]
शीत युद्ध के चरम पर अमेरिका के ग्रीनलैंड में 17 सैन्य प्रतिष्ठान थे, लेकिन वर्षों में ये बंद होते गए और अब केवल उत्तरी सिरे पर पिटुफ़िक बेस ही शेष बचा है। [A1][A3][A5] लैंड्री ने स्पष्ट किया कि “ग्रीनलैंड को संयुक्त राज्य अमेरिका की ज़रूरत है” और ट्रंप प्रशासन का मानना है कि यह द्वीप अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य है, अन्यथा यह चीन या रूस के हाथों में जा सकता है। [A3][A4] यह सुरक्षा चिंता विशेष रूप से इसलिए गंभीर है क्योंकि रूस से अमेरिका की ओर आने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का सबसे छोटा रास्ता ग्रीनलैंड के ऊपर से होकर गुज़रता है। [A1]
विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की मीडिया ने इस घटनाक्रम को अपने-अपने नज़रिए से देखा। अरब जगत की स्काई न्यूज़ अरबिया ने सामरिक ख़तरे और मिसाइल मार्ग पर ज़ोर दिया, जबकि यूरोपीय मीडिया जैसे ल तां और ला वांगार्दिया ने यात्रा की ग़ैर-आधिकारिक प्रकृति और डेनमार्क के साथ राजनयिक तनाव को उजागर किया। [A2][A5] कनाडा के रेडियो-कनाडा ने तथ्यात्मक रिपोर्टिंग की, जबकि इटली के ओपन ने जनवरी में ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर क़ब्ज़े की धमकियों से पीछे हटने की ख़बर को भी याद दिलाया, जो इस नए रुख़ को और पेचीदा बनाता है। [A3][A4]
विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका की यह पहल आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती चीनी और रूसी गतिविधियों की पृष्ठभूमि में देखी जानी चाहिए। हालांकि वाशिंगटन ने विलय की बात को फ़िलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है, लेकिन सैन्य उपस्थिति बढ़ाने पर ज़ोर यह बताता है कि प्रशासन ग्रीनलैंड को अपने प्रभाव क्षेत्र में रखने के लिए दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रहा है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड की स्थानीय सरकारें इस मुद्दे पर कैसे प्रतिक्रिया देती हैं, यह आने वाले महीनों में अहम होगा।
एक ही कहानी दूसरी जगहों पर कैसे बताई जाती है।
Trump's envoy arrived in Greenland without an invitation, but the Greenlandic premier met with him. The island's leaders reiterated that Greenland is not for sale and that their red lines must be respected. The visit is seen as a step in ongoing talks, but US ambitions remain unchanged.
The US is demanding a major role in Greenland in closed-door talks. Greenlandic officials are worried about the direction of negotiations and feel they have little leverage. The situation stems from Trump's earlier threats to seize the island.
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