रूसी ड्यूमा ने विदेश में नागरिकों की रक्षा के लिए सेना के इस्तेमाल को मंज़ूरी दी
गुरुवार को पारित क़ानून राष्ट्रपति को अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों द्वारा वांछित रूसियों की सुरक्षा के लिए विदेशों में सशस्त्र बल तैनात करने का अधिकार देता है। साथ ही, विदेशियों के निवास परमिट रद्द करने और प्रदर्शनों में भाग लेने पर निर्वासन का प्रावधान करने वाले विधेयकों को भी प्रारंभिक मंज़ूरी मिली।

रूस की संसद के निचले सदन ड्यूमा ने 13 मई को एक ऐसे क़ानून को अंतिम मंज़ूरी दे दी जो राष्ट्रपति को विदेशों में रूसी नागरिकों की रक्षा के लिए सेना इस्तेमाल करने का अधिकार प्रदान करता है। स्पेनिश समाचार पत्र अरिस्टेगुई नोतिसियास के अनुसार, इस विधेयक के पक्ष में 381 सांसदों ने मतदान किया, जिसमें कोई विरोध या अनुपस्थिति नहीं थी [A6]। यह क़ानून उन विदेशी और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के फ़ैसलों से निपटने के इरादे से लाया गया है जिनमें रूस की भागीदारी नहीं है या जिनका क्षेत्राधिकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव या रूस के साथ किसी अंतरराष्ट्रीय संधि पर आधारित नहीं है [A2][A8]। इसे स्पष्ट रूप से हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, जिसने 2023 में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और बाल अधिकार आयुक्त मारिया ल्वोवा-बेलोवा की गिरफ़्तारी के वारंट जारी किए थे [A2]।
रक्षा मंत्रालय द्वारा तैयार यह क़ानून “नागरिकता” और “रक्षा” संबंधी संघीय क़ानूनों में संशोधन करता है और राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे सशस्त्र बलों को विदेश में “रूसी नागरिकों की सुरक्षा के कार्यों” में लगा सकते हैं यदि उन्हें गिरफ़्तार किया गया हो, हिरासत में रखा गया हो या आपराधिक या अन्य अभियोजन का सामना करना पड़ रहा हो [A8][A10]। सरकारी बयानों में इसे “अमित्र विदेशी राज्यों की ग़ैरकानूनी कार्रवाइयों” से बचाव का उपाय बताया गया [A10]। ड्यूमा अध्यक्ष व्याचेस्लाव वोलोदिन ने तर्क दिया कि “पश्चिमी न्याय प्रणाली असहमत लोगों के ख़िलाफ़ दमन का औज़ार बन गई है” [A5]। हालांकि, नोवाया गज़ेता ने विधि विशेषज्ञों के हवाले से लिखा कि यह क़ानून अंतरराष्ट्रीय क़ानून का पूर्णतः खंडन करता है और संभवतः एक “धमकी भरा” प्रतीक बनकर रह जाएगा [A2]। रूसी स्वतंत्र मीडिया ने इसे “हेग पर आक्रमण का क़ानून” का नाम दिया, और यह भी रेखांकित किया कि इसका दायरा इतना व्यापक है कि इसके तहत शैडो बेड़े के जहाज़ों की सुरक्षा को भी न्यायोचित ठहराया जा सकता है [A12]।
इसी दिन ड्यूमा ने प्रथम वाचन में विदेशियों से जुड़े दो अन्य कड़े विधेयकों को भी मंज़ूरी दी। एक विधेयक के तहत यदि किसी विदेशी नागरिक का किसी भी तरह का आपराधिक रिकॉर्ड है, चाहे वह रूस में हो या विदेश में, तो उसका निवास परमिट (वीएनज़ेड) और नागरिकता का आवेदन अस्वीकार कर दिया जाएगा [A1][A14]। दूसरे विधेयक में प्रशासनिक अपराध संहिता में 58 नए अपराध जोड़े गए, जिनके लिए विदेशियों को रूस से निर्वासित किया जा सकेगा। इनमें बिना अनुमति वाली रैलियों में भाग लेना, सेना को “बदनाम” करना, प्रतिबंधों की वकालत करना और छोटी-मोटी गुंडागर्दी जैसे कृत्य शामिल हैं [A7][A13]। ये प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के नाम पर लाए गए हैं, लेकिन आलोचक इन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक और प्रहार मानते हैं।
ये विधायी क़दम ऐसे समय में उठाए गए हैं जब रूस पश्चिमी देशों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ गहराते टकराव का सामना कर रहा है। सेना संबंधी क़ानून, भले ही तत्काल प्रयोग में न आए, आईसीसी और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों को एक स्पष्ट संकेत है कि क्रेमलिन अपने नागरिकों की गिरफ़्तारी को संप्रभुता का मामला बनाएगा। दूसरी ओर, विदेशियों पर नियंत्रण को सख़्त करने वाले विधेयक प्रवासियों और आलोचकों के लिए पहले से दमनकारी माहौल को और कठोर बना देंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ये सभी विधायी पहल जल्द ही अंतिम मंज़ूरी पाकर क़ानून बन जाएंगी और रूस की आंतरिक व बाह्य नीति में आक्रामक आत्म-प्रतिरक्षा की प्रवृत्ति को मज़बूत करेंगी।
एक ही कहानी दूसरी जगहों पर कैसे बताई जाती है।
The Russian State Duma approved a law authorizing the use of the armed forces to protect Russian citizens arrested or prosecuted abroad. The law is portrayed as a defensive measure against illegitimate foreign courts, ensuring the safety of Russians worldwide. It emphasizes the state's duty to protect its citizens.
The Duma passed a law enabling the Russian military to be deployed abroad to 'protect' Russians, which critics see as a pretext for military intervention and a breach of international law. The law is alarmingly vague and could be used to justify actions similar to those in Ukraine. It represents a significant escalation in Russia's foreign policy.
The Russian Duma approved a law permitting the use of the military to protect Russian citizens detained abroad. The law passed with overwhelming support but does not automatically lead to military action. It affects an estimated 10 million Russians living outside the country.
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