पश्चिमी तट में बसने वालों ने ताजा कब्र खुलवाई, परिवार को मजबूरन दोबारा दफनाना पड़ा
जेनिन के पास अल-असासा गांव में शुक्रवार को इजरायली बाशिंदों द्वारा ताजा कब्र खुदवाने के बाद परिवार को शव निकालकर दूसरी जगह दफनाने पर मजबूर होना पड़ा। सेना जांच में जुटी है, जबकि अन्य गांवों में भी आगजनी और हमले हुए।

पश्चिमी तट में पिछले शुक्रवार की सबसे विचलित करने वाली घटना जेनिन के निकट अल-असासा गांव में घटी, जहां 80 वर्षीय हुसैन असासा के अंतिम संस्कार के कुछ ही घंटों बाद इजरायली बाशिंदे कब्रिस्तान पहुंचे और ताजा कब्र को खोदने लगे। परिवार को डर के मारे स्वयं शव निकालना पड़ा और उसे कहीं और ले जाकर दफनाना पड़ा। बेटे मोहम्मद ने बताया कि बाशिंदों ने बुलडोजर से कब्र खोदने की धमकी दी थी, जिसके बाद परिवार ने मजबूरन पिता का शव बाहर निकाला। सेना ने बाद में स्पष्ट किया कि बाशिंदों को बता दिया गया था कि ऐसा करने का कोई आधार नहीं है, और खुदाई के औजार जब्त कर घटना की जांच शुरू कर दी गई है। [A2][A3][A4]
यह वारदात अकेली नहीं थी। उसी दिन पूरे पश्चिमी तट में बाशिंदों की हिंसा फैली रही। अल-खलील के दक्षिण में खिरबेत शुवेइका गांव में एक व्यक्ति और उसके बच्चे पर धारदार हथियारों से हमला किया गया, जिससे दोनों को सिर में गंभीर चोटें आईं। नब्लस के दक्षिण में अल-लुब्बान अश्शरकिया गांव में बाशिंदों ने एक घर को आग के हवाले कर दिया और फिलिस्तीनी सिविल डिफेंस को आग बुझाने के लिए पहुंचना पड़ा। रामल्लाह के उत्तर-पूर्व में अबू फलाह गांव में बाशिंदों ने घुसकर एक नागरिक का वाहन जला दिया और घरों की दीवारों पर नस्लीय नारे लिखे। [A1]
अल-असासा का कब्रिस्तान शा-नूर नामक उस बस्ती के बिल्कुल निकट है, जिसे 2005 में बेदखली के बाद प्रधानमंत्री नेतन्याहू की सरकार ने फिर से बसाने की अनुमति दी थी। इस पृष्ठभूमि में बाशिंदों का यह दावा कि कब्र “बस्ती की सीमा के बहुत करीब” है, एक नए कानूनी-राजनीतिक तनाव को उजागर करता है। परिवार ने अंतिम संस्कार के लिए इजरायली सेना से सभी आवश्यक अनुमतियां प्राप्त कर ली थीं और दफन के समय सेना के जवान मौजूद भी थे। बावजूद इसके, बाशिंदों ने न केवल हस्तक्षेप किया बल्कि जमीन पर अपना दावा जताते हुए शव को तुरंत हटाने पर जोर दिया। [A3][A5]
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब पश्चिमी तट में बाशिंदों की हिंसा पिछले एक साल में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। अब यह केवल संपत्ति को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा के धार्मिक और सामाजिक संस्कारों को भी निशाना बनाया जा रहा है। सेना की जांच के नतीजे यह तय करेंगे कि क्या यह केवल बाशिंदों की मनमानी थी अथवा किसी संस्थागत समर्थन का मामला है, लेकिन जमीनी हकीकत में फिलिस्तीनी परिवारों के लिए असुरक्षा और भय लगातार गहराता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि शा-नूर जैसी विवादित बस्तियों के पुनर्वास ने इस तनाव को और भड़काया है, जिसके दूरगामी परिणाम क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक हैं।
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