जापान का ऐतिहासिक कदम: घातक हथियार निर्यात प्रतिबंध हटा, शांतिवाद से दूरी
प्रधानमंत्री ताकाइची के मंत्रिमंडल ने मंगलवार को लड़ाकू विमान, मिसाइल और विध्वंसक जहाज विदेशों में बेचने का रास्ता साफ किया। यह फैसला वैश्विक तनाव, यूरोपीय सुरक्षा बहस और सत्तारूढ़ दल के आंतरिक असंतोष के बीच आया।

जापान ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अपनाई गई शांतिवादी नीति से एक निर्णायक मोड़ लेते हुए मंगलवार को घातक हथियारों के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटा दिया। प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची के मंत्रिमंडल ने संशोधित दिशानिर्देशों को मंजूरी दे दी, जिससे जापान अब लड़ाकू विमान, मिसाइल, विध्वंसक और लड़ाकू ड्रोन जैसे घातक रक्षा उपकरण बेच सकेगा। अब तक वह केवल सुरक्षात्मक गियर, गैस मास्क और निगरानी रडार ही निर्यात करता था। सरकारी प्रवक्ता मिनोरू किहारा ने इस कदम को रक्षा उद्योग के लिए आर्थिक संजीवनी और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को गहरा करने वाला बताया। (A1, A6, A7, A9, A10)
यह नीतिगत बदलाव तब आया है जब दुनिया एक साथ कई सुरक्षा संकटों से जूझ रही है। यूक्रेन, जो रूसी हमलों के ख़िलाफ़ पैट्रियट मिसाइलों की घटती आपूर्ति से चिंतित है, एक वर्ष के भीतर अपनी स्वदेशी एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल प्रणाली बनाना चाहता है, जैसा कि राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने घोषित किया। (A2) यूरोपीय मोर्चे पर इटली की विपक्षी नेता एली श्लाइन ने रूसी गैस ख़रीद को पुतिन को मज़बूत करने वाला क़दम बताते हुए स्पेन के सांचेज़ मॉडल पर अधिक नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने की अपील की। (A5) इन घटनाक्रमों के बीच जापान का हथियार निर्यात खोलना एशिया-प्रशांत में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी की ओर भी इशारा करता है, जिस पर बीजिंग ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। (A7)
हालांकि, घरेलू स्तर पर ताकाइची को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के पुराने गुट उनकी दृढ़ नेतृत्व शैली को 'रानी जैसा' बता रहे हैं और दो वर्ष के लिए 8 प्रतिशत उपभोग कर स्थगित करने की योजना का विरोध कर रहे हैं। (A3) फरवरी में हुए निचले सदन के चुनाव में भारी जीत और ऊंची लोकप्रियता के बावजूद यह आंतरिक घर्षण उनके एजेंडे के लिए जोखिम बन सकता है। (A4) मंगलवार को ही उनके द्वारा यासुकुनी श्राइन में पवित्र वृक्ष अर्पित करने से चीन और दक्षिण कोरिया जैसे पड़ोसियों की ऐतिहासिक संवेदनाओं को ठेस पहुंचने की आशंका भी बढ़ गई है। (A8)
विश्लेषकों का मानना है कि यह छूट जापान के रक्षा उद्योग को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ेगी और ऑस्ट्रेलिया व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ सहयोग को नई ऊंचाई देगी। लेकिन ऐतिहासिक विवादों और क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता के बीच ताकाइची प्रशासन को आर्थिक लाभ और कूटनीतिक संतुलन के दोहरे दबाव को साधना होगा। जापान का यह क़दम न केवल उसकी सामरिक महत्वाकांक्षा को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का शांतिवाद एक नई वैश्विक व्यवस्था के सामने करवट बदल रहा है।
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