अमेरिका ने ईरानी प्रजातंत्र-समर्थक कार्यकर्ता समेत प्रवासियों को हिंसाग्रस्त अफ्रीकी देश भेजा
ट्रंप प्रशासन ने कानूनी संरक्षण प्राप्त ईरानी कार्यकर्ता सहित अफगान, तुर्की और जॉर्जिया के प्रवासियों को मध्य अफ्रीकी गणराज्य भेजा, जहां अमेरिका खुद यात्रा न करने की सलाह देता है।

शुक्रवार को अमेरिकी आव्रजन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन (आईसीई) ने लगभग 20-25 प्रवासियों को लेकर एक निर्वासन उड़ान मध्य अफ्रीकी गणराज्य (सीएआर) के लिए रवाना की। इनमें ईरान, अफगानिस्तान, तुर्की, जॉर्जिया और सीरिया के नागरिक शामिल थे, जिनमें कम से कम एक ईरानी महिला प्रजातंत्र-समर्थक कार्यकर्ता भी थी। उनके वकील एमिली ट्रॉसल ने बताया कि यह कार्यकर्ता अमेरिकी आव्रजन न्यायालय से कानूनी सुरक्षा प्राप्त करने के बावजूद इस उड़ान में भेजी गई। यह पहली बार है जब ट्रंप प्रशासन ने ईरानी प्रवासियों को किसी तीसरे देश में निर्वासित किया है, जिससे मानवाधिकार संगठनों में आक्रोश है।
यह निर्वासन ऐसे समय हुआ जब सीएआर दशकों से सशस्त्र संघर्ष, मानवाधिकार हनन और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने वहां के लिए ‘किसी भी कारण से यात्रा न करें’ की लेवल-4 चेतावनी जारी कर रखी है। ट्रंप प्रशासन ने हाल ही में ऐसे देशों से तीसरे-देश निर्वासन समझौते किए हैं, जिनमें सीएआर भी शामिल है। आलोचक इसे ‘मौत की सजा’ करार दे रहे हैं, क्योंकि जिन प्रवासियों को उनके गृह देश में प्रताड़ना का खतरा है, उन्हें भी इसी बहाने खतरनाक जगह भेजा जा रहा है।
ईरानी प्रवासियों के मामले में, कम से कम दो महिलाओं को पहले अमेरिकी न्यायाधीश से ‘निष्कासन पर रोक’ का दर्जा मिला था, जो अमेरिकी कानून के तहत प्रताड़ना के जोखिम के चलते दिया जाता है। इनमें एक महिला ने इस्लाम छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया था, जबकि दूसरी प्रजातंत्र-समर्थक आंदोलनों से जुड़ी थीं। हालांकि इस उड़ान में केवल कार्यकर्ता को भेजा गया, लेकिन वकील को आशंका है कि बाकी महिलाओं को भी भविष्य में सीएआर भेजा जा सकता है। इस कदम से यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका उन देशों के नागरिकों की सुरक्षा की परवाह करता है, जिन्हें वह ‘आतंकी शासन’ कहता है।
विभिन्न क्षेत्रों की मीडिया ने इस घटनाक्रम को अलग-अलग नजरिए से देखा। पश्चिमी मीडिया ने मानवीय पहलू और कानूनी विडंबना पर जोर दिया, जबकि इंडोनेशियाई और बांग्लादेशी आउटलेट्स ने इसे ट्रंप की सख्त आव्रजन नीति के एक और कठोर उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया। ईरानी मीडिया ने इस मामले को ईरानी विरोधियों की सुरक्षा के लिए खतरा बताया। सभी ने इस बात पर सहमति जताई कि यह कदम अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के विपरीत है।
आगे की राह में, इस प्रकार के निर्वासन से अमेरिका की वैश्विक छवि को धक्का लग सकता है, विशेषकर उन देशों में जो मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील हैं। यह ट्रंप प्रशासन की उस नीति का विस्तार है, जिसमें मेक्सिको, ग्वाटेमाला और अल सल्वाडोर जैसे देशों को पहले ही ऐसे सौदों के लिए मजबूर किया जा चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीएआर जैसे कमजोर देश को चुनना एक सुनियोजित रणनीति है, ताकि निर्वासित व्यक्तियों की पहुंच कानूनी सहायता तक न हो। इस बीच, वकील और मानवाधिकार समूह कानूनी चुनौतियों की तैयारी कर रहे हैं, ताकि भविष्य में ऐसे निर्वासन को रोका जा सके।
एक ही कहानी दूसरी जगहों पर कैसे बताई जाती है।
U.S. media report on the deportation of migrants, including an Iranian activist with legal protection, to a conflict-ridden country that the U.S. itself warns against travel. The coverage highlights the contradiction in policy and the risks faced by deportees.
Iranian diaspora outlets condemn the U.S. for deporting Iranian asylum seekers, especially a female activist and a Christian convert, to a dangerous third country with no ties to them. They stress the threat of torture and persecution if sent to Iran, framing it as a violation of human rights.
African media report the arrival of a deportation flight carrying migrants from various countries to the Central African Republic, noting the U.S. policy of third-country deportations and the State Department's own travel warning against the nation. The tone is factual, focusing on the event.
Russian media pick up the Reuters report, emphasizing the U.S. government's contradictory stance of deporting refugees to a country it considers too dangerous to visit. They highlight the plight of the Iranian women and criticize the Trump administration's immigration crackdown.
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